19 जून 2025 को पांच विधानसभा क्षेत्रों में मतदान संपन्न हुआ: एक-एक सीट पश्चिम बंगाल, केरल, पंजाब में और दो सीटें गुजरात में। वाइडली यह चुनाव “पहला चुनावी परीक्षण” है जो भारत के हालिया आतंकी हमले (पाहलगाम) और देश-विदेश अनुपालन कार्रवाई ऑपरेशन सिंदूर के बाद हुआ, जिससे इन उपचुनावों को विशेष राष्ट्रीय और राजनीतिक महत्व प्राप्त हुआ है
राज्य सीटें राजनैतिक संदर्भ
बंगाल 1 ममता बनर्जी और TMC का प्रचार जोर-शोर से
केरल 1 वामपंथी और UDF के बीच तेजी से टक्कर
पंजाब 1 AAP, कांग्रेस और भाजपा की तीव्र प्रतिस्पर्धा
गुजरात 2 भाजपा का मजबूत आधार, विपक्ष की चुनौती
चुनाव आयोग के अनुसार पूरे मतदान की प्रक्रिया सुचारु और शांतिपूर्ण रही। कुल 1,354 मतदान केंद्रों में से 1,353 पर वेबकास्टिंग की सुविधा उपलब्ध कराई गई, जिससे पारदर्शिता और निगरानी अत्यधिक सुनिश्चित हुई । इससे मतदाता विश्वास बढ़ा और चुनावी प्रक्रिया को अधिक संवादात्मक तथा तकनीकी दृष्टि से सशक्त बनाया गया।
पंजाब, बंगाल, गुजरात और केरल में मतदान प्रतिशत अपेक्षाकृत अधिक रहा, जिससे यह स्पष्ट होता है कि नागरिक अब केवल सामान्य स्थानीय मुद्दों पर ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति जैसे विषयों पर भी सक्रिय रूप से मतदान कर रहे हैं ।
22 अप्रैल 2025 को जम्मू–कश्मीर के पाहलगाम में ट्रैवेलरों पर आतंकी हमला हुआ, जिसमें लगभग 26 लोगों की जान गई। इस हमले ने देश में व्यापक आक्रोश और सुरक्षा को लेकर नई विचारधारा को जन्म दिया।
गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट रूप से कहा कि ऑपरेशन सिंदूर का उद्देश्य पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद को बढ़ावा देने का जवाब देना था । उन्होंने यह भी कहा कि भारत की “रक्त-नहीं बहने देंगे” नीति Operation Sindoor सहित सर्जिकल स्ट्राइक्स के जरिए स्पष्ट की जा रही है

इस हमले के जवाब में भारत सरकार ने 7–8 मई 2025 को “ऑपरेशन सिंदूर” नामक सटीक दूरी से आतंकियों के ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन्स के माध्यम से हमला किया। इसमें पाकिस्तान और पाकिस्तान-अधिकार वाले कश्मीर (PoK) को निशाना बनाया गया, जिसमें जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा और हिज़्बुल मुजाहिद्दीन के लगभग 9 आतंकवादी शिविरों को तबाह किया गया ।
प्रमुख उपलब्धियाँ:
100+ संदिग्ध आतंकियों को नष्ट किया गया, जिनमें प्रमुख हमलावारों के नाम शामिल हैं
मिसाइलों और ड्रोन हमलों से पाकिस्तान के एयर बेस कमजोर हुए ।
ऑपरेशन में तकनीकी और ऊर्जावान प्रतिक्रिया प्रणाली की प्रमाणित सफलता दिखी
इस ऑपरेशन को पहले “नई नार्मल” एवं पाकिस्तान की सीमाओं से परे व्यापक और निर्णायक कार्रवाई के रूप में देखा गया
कांगेस नेता भूपेश बघेल सहित कई विपक्षी समूहों ने आरोप लगाया कि यह ऑपरेशन चुनावी लाभ के लिए झूठी भावनाओं पर आधारित है, और सेना तथा राष्ट्रीय सुरक्षा का राजनीतिकरण हो रहा है

हालिया IANS–मात्राईज़ के सर्वे में 66% उत्तरदाताओं का कहना था कि ऑपरेशन पूरी तरह सफल रहा, और 72% इसे “शताब्दी की सबसे बड़ी सफलता” मानते हैं। 78% मानते हैं कि यह पाकिस्तान की परमाणु बाधा को भेदने वाली कार्रवाई थी ।
केंद्र सरकार द्वारा यह भरोसा दिया गया कि राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है। वहीं, विपक्ष द्वारा इसे चुनावी चौखट में लाने की रणनीति अपनाई गई।
उच्च मतदान प्रतिशत यह संकेत देते हैं कि लोग रक्षा और प्रत्युत्तर कार्रवाई को गंभीरता से ले रहे हैं। पंजाब में AAP और कांग्रेस के बीच की टक्कर में यह एक महत्वपूर्ण एजेंडा बन गया।
गुजरात: भाजपा पारंपरिक रूप से मजबूत, लेकिन विपक्ष सुरक्षा सूत्र पर निशा साध रहा है।
बंगाल: ममता की TMC का मुकाबला राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट और केंद्र पर सवाल खड़े करने वालों से।
केरल: समावेशी वामपंथ-यूडीएफ गठबंधन ने इसे जनहित व सुरक्षा दोनों के मुद्दों पर चुनावी विषय बनाया।
ऑपरेशन जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा कदमों को पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से जनता के बीच स्पष्ट रूप से संवाद करना चाहिए।
चुनाव आयोग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि चुनावी माहौल सुरक्षा गतिविधियों की अगली लहर न बनाए।
मीडिया को संतुलित विश्लेषण जारी रखना चाहिए: राष्ट्रवादी भावनाओं के साथ-साथ आलोचनात्मक दृष्टिकोण भी उत्पन्न होना आवश्यक है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह ऑपरेशन भारत की आतंकवाद नीति में रणनीतिक बदलाव को दर्शाता है—टेरर ग्रुप्स और उनके प्रायोजकों में कोई अंतर नहीं रहेगा । कई विद्वानों का संकेत है कि ऐसी रणनीति से भविष्य में पाकिस्तान को बढ़ते आतंकी अड्डों का समर्थन सीमित करने में मदद मिलेगी
ऑपरेशन सिंदूर ने आत्मगौरव और राष्ट्रवादी भावना को बल दिया, साथ ही यह संदेश भी गया कि अमेरिका-दोस्त रहल बाहरी दबावों के बावजूद भारत अपने हितों में कदम उठा सकता है
ऑपरेशन को लेकर विपक्ष ने सैनिक कार्रवाई को राजनीति से जोड़ने की आलोचना की, यह चेतावनी दी कि लोकतंत्र की आत्मा में राष्ट्रीय सुरक्षा की भूमिका का राजनीतिकरण अवांछनीय है
यदि भाजपा और उसके सहयोगी राज्य में मजबूत प्रदर्शन करते हैं, तो यही सूचित करेगा कि राष्ट्रवादी सुरक्षा व भावना जनता का समर्थन जीत रही है।
अगर विपक्षी दलों को मतदान में बढ़त मिलती है, तो इसका अर्थ हो सकता है कि लोगों ने राष्ट्रीय सुरक्षा को मुद्दा मानकर चुनावी निर्णय नहीं लिया, बल्कि स्थानीय मुद्दों (महत्पूर्ण सेवाएँ, बेरोजगारी, किसान, शिक्षा) को महत्व दिया
भारत के लिए यह ऑपरेशन एक संकेत है कि वह जरूरत पड़ने पर सीमाओं के पीछे आतंक प्रायोजक समूहों पर सटीक कार्रवाई करने में सक्षम है।
भविष्य में ऐसी कार्रवाइयाँ केवल सैन्य रूप में नहीं बल्कि कूटनीतिक, आर्थिक और सूचना मोर्चे पर भी हो सकती हैं।
23 जून के परिणाम न केवल राज्य सरकारों की राह तय करेंगे, बल्कि 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए भी निर्णायक लहजा तय करेंगे। ये रुझान दिखाएंगे कि क्या भारत ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ पर केंद्रित रणनीति को स्वीकार कर रहा है या फिर तत्काल विकासक मुद्दों को प्राथमिकता दे रहा है।
आगामी 23 जून के नतीजे इन उपचुनावों की महत्वाकांक्षा को दर्शाएंगे—क्या भारत की जनता सैन्य-रणनीतिक कदमों को सराहती है, या वह जैसे पहले की गत्यात्मक समस्याएँ—जैसे शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य—पर अधिक केन्द्रित है। परिणाम यह भी बताएंगे कि क्या “नया तौर” (Operation Sindoor, सर्जिकल स्ट्राइक, राष्ट्रीय सुरक्षा) लोकतंत्र के अगले चरण में मार्गदर्शक बना रहेगा।










